स्वामी-हर श्रद्धा आनन्द जी के उपदेश
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1श्री आरती पूजा दोनो समय श्रद्धा पूर्वक करे!
2 नित्य सत्संग एवम भजन अभ्यास करो!
3 श्री दरबार की निष्काम सेवा प्रसन्नतापूर्वक करे!
4 हर जगह सदगुरु की मौजूदगी का आभास करे!
5 नाम अनमोल है,नाम को ही सहारा बनाओ!
6 क़ेवल सदगुरु पर भरोसा रखो!
7आपस मे सदा सदगुरु की महिमा का गुणगान करो!
8सदगुरु मे अटूट विश्वास पैदा करो!
9सेवा करके बदले मे प्रशंसा की कामना न करो!
10बुरी संगत से बचो!
11मनुष्य मात्र के सहारे पर भरोसा न रखो!
12अपने सदगुरु को ही ईश्वर का साकार रुप मानो!
13सेवा करते समय चेहरे पर अप्रसन्न भाव न लाओ!
ॐ
आजाद स्वामी का चिन्तन-मनन
1-ऐसी चेष्टा करनी चाहिये, जिससे एकान्त स्थान में अकेळे का
ही मन प्रसन्नतापूर्वक स्थिर रहे! प्रफुल्लित चित से एकान्त में
निरन्तर नामजप से ऐसा हो सकता है !
2-भगवत्प्रेम एवं भक्ति-ज्ञान-वैराग्य-सम्बन्धी शास्त्रों को बारम्बार
पढ़ना चाहिये!
3 एकान्त देश में ध्यान करते समय चाहे किसी भी बात का
स्मरण क्यों न हों, उसको तुरन्त भुला देना चाहिये ! इस
संकल्प त्याग से ध्यान में सिद्धी प्राप्त होती है !
4 धन की प्राप्ति के उदेश्य से कार्य करने पर मन संसार में रम
जाता है, इसलिये सांसारिक कार्य बड़ी सावधानी के साथ केवल
भगवत्प्रीति के लिये ही करना चाहिये ! इस प्रकार से भी अधिक
कार्य न करे, क्योंकि कार्य की अधिकता से उदेश्य में परिवर्तन
हो जाता है !
5 सांसारिक पदार्थों और मनुष्यों से मिलना-जुलना कम रखना चाहिये !
6 संसार सम्बन्धी बातें बहुत ही कम करनी चाहिये !
7 बिना पूछे न तो किसी के अवगुण बताने चाहिये और न उनकी
तरफ ध्यान ही देना चाहिये !
1श्री आरती पूजा दोनो समय श्रद्धा पूर्वक करे!
2 नित्य सत्संग एवम भजन अभ्यास करो!
3 श्री दरबार की निष्काम सेवा प्रसन्नतापूर्वक करे!
4 हर जगह सदगुरु की मौजूदगी का आभास करे!
5 नाम अनमोल है,नाम को ही सहारा बनाओ!
6 क़ेवल सदगुरु पर भरोसा रखो!
7आपस मे सदा सदगुरु की महिमा का गुणगान करो!
8सदगुरु मे अटूट विश्वास पैदा करो!
9सेवा करके बदले मे प्रशंसा की कामना न करो!
10बुरी संगत से बचो!
11मनुष्य मात्र के सहारे पर भरोसा न रखो!
12अपने सदगुरु को ही ईश्वर का साकार रुप मानो!
13सेवा करते समय चेहरे पर अप्रसन्न भाव न लाओ!
ॐ
आजाद स्वामी का चिन्तन-मनन
1-ऐसी चेष्टा करनी चाहिये, जिससे एकान्त स्थान में अकेळे का
ही मन प्रसन्नतापूर्वक स्थिर रहे! प्रफुल्लित चित से एकान्त में
निरन्तर नामजप से ऐसा हो सकता है !
2-भगवत्प्रेम एवं भक्ति-ज्ञान-वैराग्य-सम्बन्धी शास्त्रों को बारम्बार
पढ़ना चाहिये!
3 एकान्त देश में ध्यान करते समय चाहे किसी भी बात का
स्मरण क्यों न हों, उसको तुरन्त भुला देना चाहिये ! इस
संकल्प त्याग से ध्यान में सिद्धी प्राप्त होती है !
4 धन की प्राप्ति के उदेश्य से कार्य करने पर मन संसार में रम
जाता है, इसलिये सांसारिक कार्य बड़ी सावधानी के साथ केवल
भगवत्प्रीति के लिये ही करना चाहिये ! इस प्रकार से भी अधिक
कार्य न करे, क्योंकि कार्य की अधिकता से उदेश्य में परिवर्तन
हो जाता है !
5 सांसारिक पदार्थों और मनुष्यों से मिलना-जुलना कम रखना चाहिये !
6 संसार सम्बन्धी बातें बहुत ही कम करनी चाहिये !
7 बिना पूछे न तो किसी के अवगुण बताने चाहिये और न उनकी
तरफ ध्यान ही देना चाहिये !
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